TCP/IP का परिचय और हिस्ट्री

tcp/ip सबसे पहले 1973 में आया उसके बाद 1978 में इसको 2 अलग अलग हिस्सों में अलग कर दिया गया | एक हिस्सा tcp और दूसरा हिस्सा ip था | उसके बाद 1983 में tcp ने एनसीपी (नेटवर्क कण्ट्रोल प्रोटोकॉल) की जगह ले ली और इस प्रोटोकॉल को अधिग्रहित कर लिया गया | arpanet ने कनेक्ट होकर किसी भी प्रकार के डाटा के ट्रांसफर के लिए यही प्रोटोकॉल जिम्मेदार होता है | (ARPAnet, इन्टरनेट का पूर्वज है |)

TCP/IP और THE DOD मॉडल

the dod मॉडल, osi का छोटा रूप है, और सात की जगह सिर्फ 4 लेयर है |
  • Process/Application Layer
  • Host to Host Layer/or Transport
  • Internet Layer
  • Network Access Layer/or Link
Process/Application Layer में इस तरह के प्रोटोकॉल डिफाइन किये जाते है, जिनके द्वारा हर एप्लीकेशन, नोड टू नोड कम्यूनिकेट करे और यूजर का इंटरफ़ेस कण्ट्रोल किया जा सके |

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होस्ट टू होस्ट लेयर के काम भी OSI मोड की transport लेयर के सामान है | ये एक अच्छा एंड टू एंड कम्युनिकेशन में हेल्प करता है और चेक करता है कि डिलीवरी बिना एरर के हो सके | पैकेट्स को सीक्वेंस वे में मेनेज करना भी इसी लेयर का काम है |
इन्टरनेट लेयर, OSI मॉडल की नेटवर्क लेयर के सामान है | ये उन प्रोटोकॉल्स पर निर्भर करती है जिनके द्वारा नेटवर्क पर पैकेट्स का logical ट्रांसमिशन होता है | ये प्रोटोकॉल्स, ip (इन्टरनेट प्रोटोकॉल) address के द्वारा होस्ट्स की देखरेख करता है और अलग-अलग नेटवर्क्स में होने वाले रोउटिंग को भी हैंडल करता है |
DoD Model की, नेटवर्क एक्सेस लेयर होस्ट से नेटवर्क के बीच डाटा एक्सचेंज का काम करती है | osi के डाटा लिंक और फिजिकल की तरह ही ये भी हार्डवेयर address को ध्यान में रखते हुए डाटा ट्रांसमिशन के लिए प्रोटोकॉल्स का निर्धारण करती है |

The Process / एप्लीकेशन लेयर के कुछ प्रोटोकॉल्स

 

Telnet

telnet इन्टरनेट का पहला प्रोटोकॉल है जो 1969 में डेवेलोप किया गया था | इसके द्वारा एक सिस्टम से दुसरे सिस्टम को एक्सेस किया जा सकता है जो किसी दूसरी लोकेशन पर रखा हुआ है | एक्सेस करने वाला telnet क्लाइंट और एक्सेस होने वाला telnet सर्वर कहलाता है | telnet का उपयोग command line interface (cmd) के द्वारा किया जा सकता है |

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Telnet

Secure Shell

ये भी telnet के जैसा ही है पर tcp/ip के द्वारा ये सिक्योर सेशंस बनाता है | इसके द्वारा और भी काम करवाए जाते है जैसे – रिमोट सिस्टम पर लॉगिंग करना, उन पर प्रोग्राम्स रन करना और फाइल्स को मूव करना | इन सभी कामों में डाटा को एन्क्रिप्टेड करके सेंड किया जाता है |
SSH

FTP

फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल का इस्तेमाल किसी दो सिस्टम्स के बीच फाइल्स के ट्रांसफर में किया जाता है | ftp सिर्फ एक प्रोटोकॉल ही नहीं है ये एक प्रोग्राम भी है जो एप्लीकेशन के द्वारा काम में लिया जाता है | ftp के द्वारा एम्प्लोयी के द्वारा फाइल ट्रांसफर हाथो से किया जाता है |

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FTP

TFTP

tftp, ftp का कम फीचर वाला वर्शन है | अगर आप जानते है की कैसे और क्या करना है तो आप इसका इस्तेमाल कर सकते है, ये आसान और फ़ास्ट है | इसका ज्यादा इस्तेमाल सिस्को devices में सिस्टम को मेनेज करने में किया जाता है |
TFTP

SNMP- (Simple Network Management Protocol)

इस प्रोटोकॉल का काम, नेटवर्क में हो रहे काम की इनफार्मेशन को कलेक्ट करना है | नेटवर्क में किसी भी तरह की प्रॉब्लम आने पर उसको इनफार्मेशन इसी के द्वारा दी जाती है |
SNMP

Hypertext Transfer Protocol (HTTP)

आपने बहुत सारी बहुत तेज़ वेबसाइट देखीं होंगी जोकि ग्राफ़िक्स, लिंक्स, text और ऐड और भी काफी चीज़े मिलाकर बनती है और बनने के बाद इसको चलने का काम एचटीटीपी के ऊपर ही निर्भर करता है | 
http-blogittttt
आपके वेब ब्राउज़र और वेब सर्वर के बीच में कम्युनिकेशन बनाये रखता है और आप जिस भी लिंक पर क्लिक करते है उससे सम्बंधित सही जानकारी आप तक पहुंचाने की जिम्मेदारी इसी की है | और यहाँ कितना सटीक होना चाहिए आप समझ सकते है क्यों आजकल इतनी वेबसाइट है और एक वेबसाइट एक बार में पता नहीं कितने लोगो से कनेक्ट रहती है उदाहण के तौर पर गूगल या फिर फेसबुक को देख लीजिये |

Hypertext Transfer Protocol Secure (HTTPS)

hypertext transfer protocol भी सिक्योर HTTPS की तरह जाना जाता है | ये secure socket layer (ssl) का इस्तेमाल करता है | वैसे तो काफी सरे तथ्य है इसके पर उन सब के अलावा आपको बस ये जान लेना चाहिए की ये प्रोटोकल आपके वेब कम्युनिकेशन को सुरक्षित करता है | जैसे आप देख सकते है आजकल बैंक्स की साइट्स सिक्योर होती है |

NetworkTimeProtocol (NTP)

जैसा की आप जानते होंगे की ये प्रोटोकॉल आपके कंप्यूटर के टाइम को औटोमिक क्लॉक सर्वर से सिंक्रोनाइज करता है और आपके कंप्यूटर पर बिक्ल्कुल सही समय दीखता है | वैसे तो ये साधारण लगता है कि इसका क्या काम होता होगा पर टेक्नोलॉजी में इसका बड़ा योगदान है | आप देखिये अगर टाइम सिंक नहीं होगा तो आपका बैंक से कोई भी ट्रान्सफर नही कर पाएंगे | आपने देखा होगा की सिक्योर ट्रांसफर कितना तेज़ी से होता है तो ntp वहां पर बहुत बड़ा रोल निभा रहा होता है |
NTP
Domain Name Service (DNS)
DNS का काम नाम बदलना है, खास करके इन्टनेट नेम्स (WWW) से शुरू होने वाले | पर इसको आपको अपने हाथो से इस्तेमाल करने की जरुरत नहीं है | जैसे ही आप Cisco.com पिंग करेंगे तो dns अपने आप ही इसको बदल कर इसका IP एड्रेस दिखा देखा | dns ने इन्टरनेट को बहुत ही आसान कर दिया है | जिस तरह से आप अपने मोबाइल पर हर मोबाइल नंबर याद नहीं रख सकते और नंबर की जगह आप जिसका नंबर है उसका नाम लिख देते है और आपको सर्च करने में आसानी होती है उसी तरह से dns काम करता है जब आप किसी भी साईट का नाम टाइप करते है तो dns उस नाम से जुड़े हुए IP एड्रेस को इन्टरनेट पर सर्च करके अपने आप खोल देता है |
Dynamic Host Configuration Protocol (DHCP)/Bootstrap Protocol (BootP)
DHCP का काम होस्ट्स हो ip एड्रेस देना है | ये सभी कंपनियों के लिए, फिर वो चाहे छोटी हो या फिर बड़ी काम को और भी आसान बनाने का काम करता है | dhcp सर्वर के लिए बहुत सारे हार्डवेयर काम में लिए जाते है उनमे से एक cisco के राऊटर भी है | dhcp, bootp से बिलकुल अलग है | bootp होस्ट्स हो एड्रेस तो प्रोवाइड करा देता है पर होस्ट्स का हार्डवेयर एड्रेस bootp की टेबल में मैन्युअली डालना पड़ता है | आप dhcp को डायनामिक bootp की तरह देख सकते है | पर आपको बता दू कि bootp ऑपरेटिंग सिस्टम भेजने का काम भी करता है जिससे क्लाइंट बूट कर सकते है | काफी चीज़े है जो dhcp प्रोवाइड करवाता है उनमे से ये कुछ खास है –
1. IP एड्रेस
2. Subnet Mask
3. Domain Name
4. Default Gateway (Routers)
5. DNS Server Address
6. Wins Server Address

Automatic Private IP Addressing (APIPA)
ओके, सोचिये क्या हो अगर आपके पास एक स्विच हो और उस स्विच से कुछ सिस्टम्स कनेक्टेड हो और आपके पास dhcp सर्वर न हो ? तो आप static ip addressing कॉन्फ़िगर कर सकते है | पर आपको ये करने की जरुरत नहीं पड़ेगी क्योंकि माइक्रोसॉफ्ट एक सर्विस प्रोवाइड करवाता है जिसको apipa कहते है | इसके अतर्गत अगर dhcp सर्वर ना हो तो माइक्रोसॉफ्ट ऑपरेटिंग सिस्टम अपने आप ही सभी सिस्टम आपस में कॉन्फ़िगर कर देता है अपनी ip रेंज में से सभी सिस्टम्स को ip लगाकर | The IP address range for APIPA is 169.254.0.1 through 169.254.255.254.

Host to Host Layer/Transport Layer  के कुछ प्रोटोकॉल्स

ये लेयर डाटा को सेंड करने लिए तेयार करता है | इस लेयर में 2 प्रकार के प्रोटोकॉल्स आते है :-
1. Transmission Control Protocol (TCP)
2. User Data gram Protocol (UDP)

1. Transmission Control Protocol (TCP)
टी सी पी प्रोटोकॉल एप्लीकेशन से भारी मात्रा में डाटा को उठाता है और उसको छोटे छोटे सेगमेंट में बांटता है | ये हर एक सेगमेंट को एक नंबर लगाकर आगे भेजता है ताकि रिसीव करने वाले को भी सीक्वेंस से ही डाटा मिले और डाटा में कोई गड़बड़ ना हो | एक सेगमेंट सेंड करने के बाद रिसीवर के द्वारा acknowledgement का वेट करता है acknowledgment मिलने के बाद ही दूसरा सेगमेंट सेंड किया जाता है | इस प्रकार के प्रोतोकोल में डाटा पहुंचा या नहीं इसकी इनफार्मेशन पहले ली जाती है | इसलिए इस प्रकार का कनेक्शन connection ओरिएंटेड की केटेगरी में आता है |
2. User Data gram Protocol (UDP)
udp टी सी पी सेर थोडा अलग प्रोटोकल है | ये टी सी पी की तरह सेगमेंट की सीक्वेंस नहीं करता है और ना ही ध्यान रखता है की कौनसा पैकेट पहले आ रहा है और कौनसा पैकेट बाद में | UDP बस सेगमेंट को सेंड करता है और भूल जाता है | डाटा पहुंचा या नहीं इसकी भी इनफार्मेशन ये नहीं लेता है | क्योंकि ये unreliable प्रोटोकॉल की केटेगरी में आता है | पर इसका मतलब ये नहीं है की ये बेकार है और इफेक्टिव नहीं है | ये टी सी पी की जैसे वर्चुअल सर्किट भी नहीं बनाता और ना ही डाटा भेजने से पहले डेस्टिनेशन सिस्टम से कांटेक्ट करता है | तो इन प्रोसेस के ना होने की वजह से ही ये प्रोटोकॉल टी सी पी से बहुत तेज़ है | इसलिए जब भी कभी ऐसा एप्लीकेशन जिसमे तेज़ी के साथ डाटा सेंड किया जाना है तो UDP को ही इस्तेमाल किया जाता है |
होस्ट तो होस्ट लेयर के मुख्य बिंदु
Port Numbers of TCP and UDP

The Internet Layer Protocols

dod मॉडल में इन्टरनेट लेयर को 2 मुख्य कारणों से काम में लिया जाता है एक तो रूटिंग के लिए और दूसरा ऊपर की लेयर को सिंगल नेटवर्क इंटरफ़ेस प्रोवाइड करवाने के लिए | इन्टरनेट लेयर बाकि सभी प्रोटोकॉल को भी जोड़े रखने का काम भी करती है | इन्टरनेट लेयर के कुछ मुख्य प्रोटोकॉल्स है जो इस प्रकार है :-
1.Internet Protocol (IP)
2.Internet Control Message Protocol (ICMP)
3.Address Resolution Protocol (ARP)
1. Internet Protocol (IP)
इस लेयर में मुख्य प्रोटोकॉल ip है और बाकी प्रोटोकॉल्स इसको सपोर्ट करने के लिए है | ip बहुत बड़ा है और ये सभी को आपस में जोड़ कर रखता है | ip हर पैकेट के एड्रेस में पाया जाता है इसी की वजह से रूटिंग टेबल में पता लगाया जाता है कि किसी भी पैकेट को कौनसी दिशा में भेजना है | नेटवर्क में किसी भी डिवाइस की पहचान के लिए फिजिकल और लॉजिकल दोनों ही प्रकार के एड्रेस के आवश्यकता पड़ती है | राऊटर के द्वारा प्राप्त किये जाने वाले पैकेट को आगे भेजने के लिए लिए जाने वाले डिसिशन ip के ऊपर ही होते है |
2.Internet Control Message Protocol (ICMP)
ये प्रोटोकॉल नेटवर्क लेयर पर काम करता है और इसका IP के द्वारा इस्तेमाल किया जाता है | ये साधारणतया मेनेजमेंट और मेसेंज़िंग प्रोटोकॉल है | ये प्रोटोकॉल, नेटवर्क में एरर होने पर एक मेसेज होस्ट तक पहुचाने का काम करता है |
Destination Unreachable – अगर राऊटर किसी ip डाटाग्राम को आगे भेजने में सक्षम नहीं हो पता तो वो वापस होस्ट को एक रिवर्स मेसेज सेंड करता है कि वो डाटा को आगे नहीं भेज पा रहा है या फिर डेस्टिनेशन अवेलेबल नहीं है | 
icmp blogittttt
3.Address Resolution Protocol (ARP)
arp किसी भी नेटवर्क में ip एड्रेस से किसी भी होस्ट का हार्डवेयर एड्रेस फाइंड करने का काम करता है | याद रखे ऊपर की लेयर के द्वारा किसी भी डाटा को आगे भेजने के लिए पहले ही डेस्टिनेशन ip एड्रेस बता दिया जाता है लेकिन अगर किसी कारण वश ip एड्रेस नहीं मिलता तो arp टेबल का इस्तेमाल किया जाता है इसके द्वारा एक ब्रॉडकास्ट मेसेज सभी होस्ट हो भेजा जाता है जिसमे उनको ip एड्रेस बता कर उनका हार्डवेयर एड्रेस पुचा जाता है ताकि डाटा जिसका है उसी के पास भेजा जा सके |
arp blogittttt

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