नेटवर्किंग मॉडल्स के बारे में | ccna

सबसे पहले थोड़ा सा इतिहास

जब नेटवर्क अस्तित्व में आया तब एक कंप्यूटर उसी कंपनी के कंप्यूटर से कनेक्ट हो सकता था | उदहारण के लिए IBM और DEC net के सिस्टम आपस में कनेक्ट नहीं हो सकते थे | 
इस प्रतिबंध को हटाने के लिए गत 1970 में International Organization for Standardization (ISO) के द्वारा एक Open System Interconnection (OSI) Reference Model बनाया गया | OSI मॉडल का मतलब था, इसकी मदद से कंपनियां ऐसे नेटवर्क उपकरण बना सके, जो आपस में इनफार्मेशन को एक्सचेंज कर सकें और ऐसे सॉफ्टवेयर जिनकी मदद से अलग-अलग कंपनी के उपकरण शांति से आपस में कनेक्ट हो जाये |

The Layered Approach

आपको समझना होगा कि रेफरेंस मॉडल एक ऐसी वैचारिक रुपरेखा है जो बताती है कि कम्युनिकेशन कैसे होना चाहिए | ये मॉडल प्रभावी कम्युनिकेशन के लिए सारे प्रोसेसेस का पता रखता है और इनको लॉजिकल ग्रुप में डिवाइड करता है, जिनको लेयर्स कहा जाता है | जब इस तरह का कोई सिस्टम तेयार किया जाता है तो उसको hierarchical or Layered Architecture कहा जाता है |
सॉफ्टवेर डेवेलपर्स के लिए भी इस मॉडल का होना जरुरी है | वे अक्सर कंप्यूटर कम्युनिकेशन प्रोसेस को समझने के लिए रिफरेन्स मॉडल को इस्तेमाल करते है इसके बाद वे समझ सकते है कि दी हुई लेयर पर कौनसा फंक्शन काम करना चाहिए | इसका मतलब है की अगर कोई किसी खास लेयर के लिए प्रोटोकॉल बना रहा है तो उनको उसी लेयर के कार्य के बारे में पता होना चाहिए | सॉफ्टवेर ऐसे होते है कि दूसरे लेयर के प्रोटोकॉल से लिंक हो जाएँ और ऐसे बनाये जाते है जो जल्दी से देप्लोय हो जाएँ और जिनसे कुछ एक्स्ट्रा काम करवाए जा सकें | इस तरह के काम को technically “Binding” कहा जाता है | और लेयर्स के बीच में जो कम्युनिकेशन प्रोसेस होता है वो किसी एक लेयर पर बाउंड हो जाता है (ग्रुप हो जाता है) |

रेफरेंस मॉडल के फायदे | Advantages of Reference Model

वेसे तो OSI मॉडल के बहुत फायदे है पर जो मुख्य है वो ये की अलग-अलग कंपनी के उपकरण आपस में कनेक्ट हो सकते है |
  1. ये नेटवर्क कम्युनिकेशन को छोटे और आसन भागो में बाँट देता है जिससे कि कॉम्पोनेन्ट डिजाईन करने में, उनको डेवेलप करने और troubleshoot करने में सहायता मिलती है |
  2. ये अलग-अलग कम्पनीज को एक नियम (standard) के तहत ही उपकरण बनाने पर जोर डालता है |
  3. ये मॉडल, इंडस्ट्री के स्टैंडर्ड्स को आगे रखते हुए, ये साफ़-साफ़ बताता है कि कौनसी लेयर पर कौनसे कार्य किये जायेंगे |
  4. ये विभिन्न प्रकार के नेटवर्क हार्डवेयर और सॉफ्टवेर को आपस में कम्युनिकेशन की इज़ाज़त देता है |
  5. जल्दी से किये गए डेवेलपमेंट से आने वाली समस्या से, ये एक लेयर से दूसरी लेयर को बचाता है |

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